आनापानसति ध्यान विधि

कई नए ध्यानियों ने पूर्व मे मुझसे यह प्रश्न पूछा कि कोई ध्यान की ऐसी विधि बताए जिसको करके हम अपने नकारात्मक तथा व्यथित एवं ग्रसित विचारों पर अंकुश लगा सके? तो उन सभी के लिए एकमात्र ध्यान विधि यह है कि अपनी स्वाभाविक सांसो के प्रति केवल एकाग्रचित रहें केवल उनको देखने का कार्य करें इसके अतिरिक्त दूसरा कोई कार्य न करें इस ध्यान विधि को आनापानसति ध्यान विधि के नाम से भी जाना जाता है जिसके बारे मे विस्तारपूर्वक आज मै आपको बताऊंगा। आनापानसति ध्यान का अनुभव दो श्वासों के बीच घटित हो सकता है। श्वास के भीतर आने के पश्चात और बाहर लौटने के ठीक पूर्व ।। हम जन्म से मृत्यु के क्षण तक निरंतर श्वास लेते रहते है। इन दो बिंदुओं के बीच सब कुछ बदल जाता है। सब चीज बदल जाती है। कुछ भी बदले बिना नहीं रहता। लेकिन जन्म और मृत्यु के बीच श्वास क्रिया अचल अर्थात निरन्तर चलती रहती है। बच्चा जवान होगा, जवान बूढ़ा होगा। वह। बीमार होगा। उसका शरीर रूग्ण और कुरूप होगा। सब कुछ बदल जायेगा। वह सुखी होगा, दुःखी होगा, पीड़ा में होगा, सब कुछ बदलता रहेगा। लेकिन इन दो बिंदुओं के बीच आदमी श्वास भर सतत लेता रहेगा। श्वास क...